rahim ke dohe in hindi / रहीम दास के दोहे

रहीम के दोहे (rahim ke dohe) आपने जरूर पढ़े होगें, लेकिन क्या कभी आपने परखा है कि, 500 साल पहले लिखे गये दोहे भी आज के समाज के साथ कितना मेल खाते हैं।

दोस्तों, इस पोस्ट में आपको रहीम दास के जीवन से जुड़ी जानकारी और रहीम के दोहे अर्थ सहित मिलेगें।

हमें आशा है, कि इस पोस्ट के माध्यम से आपको कुछ नया अवश्य सीखने को मिलेगा, और साथ ही, मैं चाहूंगी कि आप कुछ अच्छी बातें अपने जीवन में भी उतारें

रहीम दास का जीवन परिचय

  • जन्म – 17 दिसम्बर 1556 ई.
  • मृत्यु – 1627 ई.
  • जन्म स्थान – लाहौर
  • मृत्यु स्थान – चित्रकूट
  • अभिभावक – बैरम खां – सुल्ताना बेगम
  • दरबारी कवि / सरक्षंक / समकालीन – अकबर
  • मुल्ला मुहम्मद अमीन रहीम के शिक्षक थे।

रहीम दास का बचपन

अब्दुल रहीम खान खाना का जन्म 17 दिसम्बर 1556 इतिहास प्रसद्धि बैरम खां के घर लाहौर में हुआ था।

इनके पिता का नाम बैरम खान तथा माता का नाम सुल्ताना बेगम था। रहीम के जन्म के समय इनके पिता की उम्र 60 वर्ष हो चुकी थी।

बैरम खान की दूसरी पत्नी का नाम सईदा खां था। यह बाबर की बेटी गुलरूम बेगम की पुत्री थी। खान खाना की उपाधि अकबर ने इनके पिता बैरम खान को दी थी। वे अकबर के संरक्षक के रूप में कार्यरत थे।

शादी – रहीम का पहला विवाह मारबानो से हुआ। मारबानो ने दो बेटियों और तीन बेटों को जन्म दिया।

प्रमुख रचनाएँ

बरवै नायिका भेद, श्रृंगार सतसई, श्रृंगार सोरठा, मदनाष्टक,नगर शोभा, खेल, कौतुरूम, रासपंचाध्यायी

रहीम दास की अरबी, तुर्की, संस्कृत, ब्रजी, अवधि पर समान रूप से अधिकार था। कृष्ण भक्त, नीतिकार और आश्रयदाता के रूप में भी उन्हें स्मरण किया जाता है।

पहले बेटे का नाम इरीज़, दूसरे का नाम दाराब और तीसरे का नाम फरन था। यह नाम अकबर ने रखे थे।

रहीम की बड़ी बेटी नाम जाना बेगम जिसका निकाह शहजादा दनिभाव से हुआ व छोटी बेटी का निकाह मीर अमीनु दीन से हुआ।

रहीम का दूसरा निकाह सौदा जाति की एक लड़की से हुआ।

जिससे एक बेटे रहमान दाद का जन्म हुआ रहीम का तीसरा निकाह एक दासी से हुआ उससे भी एक बेटे मिर्जा अमरूल्ला का जन्म हुआ।

मुस्लिम धर्म के अनुयायी होते हुए भी रहीम ने अपनी काव्य रचना द्वारा हिंदी साहित्य की जो सेवा की वह अद्धत है।

भाषा शैली (rahim ke dohe वा अन्य)

रहीम ने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में ही कविता की है जो बहुत ही सरल है।

यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय।
बैर प्रीति अभ्यास जस,होत होत ही ही।

उनके काव्य में श्रृंगार, शांत तथा हास्य रस मिलते है।

दोहा, सोरठा, बिरवे,कवित्त और सवैया उनके प्रिय छंद है।
रहीम ने तुर्की भाषा में लिखी बाबर की आत्मकथा ” तुजके बाबरी ” का फ़ारसी में अनुवाद किया।

मआसिरे रहीमी” और “आईने अकबरी” में भी खानखानारहीम नाम से कविता की हैं।

रहीम व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण के भक्त थे।

रहीम ने अपने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथो के कथानकों को लिया है।

आपने स्वयं को ” रहिमन ” कहकर भी सम्बोधित किया है।

इनके काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम और श्रृंगार समावेश मिलता है।

1584 में अकबर ने रहीम को खान – ए – खाना की उपाधि से सम्मानित किया। इस पर अकबर ने अपने समय की सर्वोच उपाधि ” मीरअर्ज ” से रहीम को विभूषित किया।

रहीम का निधन –

रहीम का देहांत 71 वर्ष की आयु में सन 1627 में हुआ। रहीम को उनकी इच्छा के अनुसार दिल्ली में ही उनकी पत्नी के मकबरे के पास ही दफना दिया गया। यह मजार आज भी दिल्ली में मौजूद है। रहीम ने स्वं ही अपने जीवनकाल में इसका निर्माण करवाया था।

रहीम के दोहे (rahim ke dohe)-

rahim ke dohe


रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि बड़ी वस्तु के लालच में किसी भी छोटी चीज के महत्व को कम नहीं समझना चाहिये। किसी भी बड़ी वस्तु की पाने चाह में छोटी चीज का तिरस्कार नहीं करना चाहिये।


रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहें, बनत न लगिहैं देर।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि जब बुरे दिन आए हों तो चुप ही बैठना चाहिये, क्योकि जब अच्छे दिन आते हैं , तब बात बनते देर नहीं लगती।


ससि संकोच, साहस, सलिल, मान, स्नेह, रहीम।
बढ़त – बढ़त बढ़ि जात है, घटत – घटत घटि सोम।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि चन्द्रमा, संकोच, साहस, जल, सम्मान और स्नेह, ये सब ऐसे है, जो बढ़ते – बढ़ते बढ़ जाते हैं, और घटते – घटते घटने की सीमा को छू लेते है।


रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय।
नर को बस कारिबो कहा, नारायन बस होय।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं , कि शत – प्रतिशत मन लगाकर किये गए काम को देखे उनमें कैसी सफलता मिलती हैं। अगर अच्छी नियत और मेहनत से कोई भी काम किया जाए तो सफलता मिलती ही हैं, क्योकि सही एवं उचित परिश्रम से इंसान ही नहीं भगवान को भी जीता जा सकता हैं।


देनहार कोउ और हैं, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरै, याते नीचे नैन।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि हम कहां किसी को कुछ देते हैं। देने वाला तो दूसरा ही हैं, जो रात – दिन भेजता रहता हैं, इन हाथों से दिलाने के लिए लोगों को व्यर्थ ही भरम हो गया हैं, कि रहीम दान देता हैं। मेरे नेत्र इसलिए नीचे को झुके रहते हैं, और दान लेकर उसे दीनता का अहसास न हों।


रहिमन पानी रखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष, चून।।

अर्थ – इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है। पानी का पहला अर्थ, मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता ( पानी ) होना चाहिये।

पानी का दूसरा अर्थ, तेज या चमक से हैं, जिसके बिना मोती का कोई मूल्य नहीं हैं।

पानी का तीसरा अर्थ, जल से है, जिसे आते ( चून ) से जोड़कर दर्शाया गया है। रहीम का कहना है, कि जिस तरह आटे का अस्तित्व पानी के बिना नम नहीं हो सकता हैं।

उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा पानी ( विनम्रता ) रखना चाहिये जिसके बिना उसका मूल्यहास होता है।


तरुवर फल नहि खात हैं, सरवर पियहि न पान।
काहि रहीम पर काज हित, सम्पति सँचहि सुजान।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं, और नदी भी अपना पानी स्वयं नहीं पीती हैं। इसी तरह अच्छे और सज्जन व्यक्ति वो हैं, जो दूसरों के कार्य के लिए सम्पत्ति को संचित करते हैं।


मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो न मिले, कोटिन करो उपाय।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं, कि मन, मोती, फूल, दूध और रस जब तक सहज और सामान्य रहते हैं, तो अच्छे लगते हैं, परन्तु यदि एक बार ये फट जाएं तो करोड़ों उपाय कर लो वे फिर वापस अपने सहज रूप में नहीं आते।


जो रहीम ओछो बढ़े, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फर्जी भयो, टेढ़ो – टेढ़ो जाय।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि जब बुरे लोग जब प्रगति करते हैं, तो बहुत ही इतराते हैं, वैसे ही जैसे शतरंज के खेल में जब प्यादा फर्जी बन जाता है तो टेढ़ी चाल चलने लगता हैं।


खैर, खून, खाँसी, सुखी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबे, जानत सकल जहान।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते है, कि दुनिया जानती हैं, कि खैरियत, खून, खांसी, खुशी, दुश्मनी, प्रेम और मदिरा या नशा छुपाए नहीं छुपते हैं।

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